Nepal Politics
Nepal Politics: नेपाल का इतिहास गोरखा एकता से शुरू होकर राजशाही, माओवादी संघर्ष और गणराज्य तक पहुँचा। अब 2025 में सोशल मीडिया बैन और युवा आंदोलन ने देश की राजनीति को नया मोड़ दिया है।
नेपाल—हिमालय की गोद में बसा छोटा-सा देश, लेकिन इतिहास और राजनीति के उतार-चढ़ाव ने इसे हमेशा दुनिया की सुर्खियों में बनाए रखा है। 18वीं सदी में जब गोरखा शासक पृथ्वी नारायण शाह ने बिखरी हुई रियासतों को एक धागे में पिरोया, तब आधुनिक नेपाल की नींव रखी गई। पर उसी के बाद से इस पहाड़ी राष्ट्र का सफ़र कभी आसान नहीं रहा। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से टकराव और सुगौली संधि, फिर राणा शासकों की तानाशाही, भारत और चीन के बीच की भू-राजनीति और 20वीं सदी में लोकतंत्र की मांग—हर दौर ने नेपाल की राजनीति को नई दिशा दी।
1940 के दशक में जब लोकतांत्रिक आंदोलन ने रफ़्तार पकड़ी, तब राजा त्रिभुवन की वापसी और नेपाली कांग्रेस की स्थापना ने जनता में उम्मीद जगाई। लेकिन सत्ता संघर्ष, पंचायत व्यवस्था और राजशाही की पकड़ ने बदलाव की रफ़्तार को धीमा किया। 1990 के दशक तक आते-आते माओवादी आंदोलन ने नेपाल को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया। 2001 के राजमहल हत्याकांड ने तो पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया।
माओवादियों के साथ 2006 में हुए शांति समझौते और 2008 में राजशाही की समाप्ति के बाद नेपाल एक गणराज्य बना। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता यहीं ख़त्म नहीं हुई। बार-बार बदलती सरकारें, संविधान निर्माण की जटिल प्रक्रिया और बाहरी दबावों ने नेपाल को लगातार झकझोर कर रखा। 2015 में संविधान पारित हुआ और नेपाल धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ, लेकिन इसके बाद भी राजनीतिक स्थिरता सपना ही बनी रही।
और अब 2025 में, नेपाल फिर एक नए मोड़ पर खड़ा है। इस बार मुद्दा बना – सोशल मीडिया और युवाओं की आवाज़। सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे 26 बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार का तर्क था कि ये कंपनियां स्थानीय क़ानूनों का पालन नहीं कर रही थीं। दिलचस्प बात यह रही कि चीन की कंपनी टिकटॉक ने शर्तें मान लीं, इसलिए वही अब भी चल रहा है। यही टिकटॉक युवाओं के गुस्से और आंदोलनों का नया अड्डा बन गया।
युवा प्रदर्शनकारियों ने टिकटॉक पर ‘नेपो बेबी’ ट्रेंड चलाया, जिसमें नेताओं के बच्चों की आलीशान ज़िंदगी पर सवाल उठाए गए। यह डिजिटल आंदोलन सड़कों तक आ गया और देखते ही देखते हिंसक टकराव में बदल गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं, कई लोगों की मौतें हुईं और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया। नेपाल की राजनीति आज फिर एक चौराहे पर है—क्या यह देश बार-बार सत्ता संघर्ष और अस्थिरता की ओर बढ़ेगा, या युवा वर्ग के डिजिटल विद्रोह से कोई नया लोकतांत्रिक अध्याय शुरू होगा?
नेपाल का इतिहास बताता है कि इस छोटे से पहाड़ी देश में हर संकट एक नए बदलाव की राह बनाता है। सवाल है कि 2025 का यह सोशल मीडिया विद्रोह—क्या नेपाल के लोकतंत्र को और मज़बूत करेगा या इसे एक और लंबे संघर्ष की ओर धकेल देगा?
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