Bihar Voter List Controversy@apmtimes
Bihar Voter List Controversy: बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर विवाद। चुनाव आयोग ने 2002-03 की प्रक्रिया को आधार मानते हुए 97 दिन की समय-सीमा और EPIC कार्ड को पात्रता प्रमाण न मानने का निर्णय लिया। जानिए सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई और मतदाता अधिकारों की चुनौती।
बिहार में आगामी चुनावों को लेकर चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने राजनीतिक और न्यायिक स्तर पर गंभीर बहस को जन्म दिया है। निर्वाचन आयोग (ECI) ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए न केवल 2002-03 के गहन पुनरीक्षण को मानक बताया, बल्कि 25 जून से 30 सितंबर, 2025 तक की तीन महीने की समय-सीमा को पर्याप्त ठहराया। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता पहचान पत्र (EPIC) को वर्तमान प्रक्रिया में पात्रता का प्रमाण मानने का सर्वोच्च न्यायालय का सुझाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
हालांकि, पूर्व ईसीआई अधिकारी और उन राज्यों में कार्यरत मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, 2002-03 में लागू प्रक्रिया पूरी तरह से भिन्न और व्यापक थी। उस समय सात राज्यों—बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब—को आठ महीने का समय दिया गया था, जो मौजूदा समय-सीमा से दोगुना से अधिक है। उस दौर में मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC) मौजूदा मतदाताओं के सत्यापन का प्रमुख आधार था, लेकिन नए आवेदकों से नागरिकता प्रमाणपत्र या अन्य दस्तावेज़ मांगे जा सकते थे।
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि 2002-03 का गहन संशोधन 243 दिनों तक चला। इस दौरान गणनाकारों का प्रशिक्षण, घर-घर जाकर सत्यापन, दावों व आपत्तियों की जांच, मसौदा सूची का निर्माण और अंतिम प्रकाशन सभी चरण शामिल थे। इसके विपरीत, 2025 का SIR केवल 97 दिनों में पूरा होना है। इसमें गणनाकारों को प्रशिक्षित करने, सर्वेक्षण करने और मतदान केंद्रों का युक्तिकरण करने के लिए केवल एक महीना रखा गया है। मसौदा नामावलियों का प्रकाशन 1 अगस्त को होना है, और दावों तथा आपत्तियों के निपटारे के लिए 25 दिन निर्धारित हैं। अंतिम प्रकाशन 1 अक्टूबर को तय है, जो चुनाव तिथियों की संभावित घोषणा से कुछ ही सप्ताह पहले है।
संकुचित समय-सीमा के कारण कई मतदाता आवश्यक दस्तावेज़ जुटाने में संघर्ष कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अवधि अनुचित रूप से कम है, और चुनाव आयोग राष्ट्रीयता से जुड़े ऐसे सवालों में उलझा है जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
नागरिकता प्रमाण और EPIC का मुद्दा भी विवाद का मुख्य केंद्र है। आयोग का कहना है कि 2003 के गहन पुनरीक्षण के तहत सूची में शामिल मतदाताओं की पात्रता अब तक मान्य है, और उन्हें कोई अतिरिक्त प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। उस समय गणनाकर्ताओं ने केवल मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर घर-घर जाकर यह सत्यापित किया कि सूची में दर्ज वयस्क भारतीय नागरिक अभी भी सामान्य निवासी हैं। इसके अतिरिक्त, केवल दो अपवाद थे—पहला, नए मतदाता बनने वाले और दूसरा, जिन क्षेत्रों में विदेशी नागरिकों की संख्या अधिक थी।
लेकिन 2025 के SIR में आयोग ने यह मानने से इनकार किया कि EPIC कार्ड को पात्रता का प्रमाण माना जाए। आयोग का कहना है कि यह पुनरीक्षण पूरी तरह से नयी सूची तैयार करने का प्रयास है, और EPIC कार्ड स्वयं पहले से जारी मतदाता सूची पर आधारित होते हैं। पूर्व राज्य सीईओ और वरिष्ठ अधिकारी इस बदलाव को चिंताजनक मानते हैं। उनका कहना है कि दो दशक पहले की प्रक्रिया मतदाताओं की पहचान और सूची की विश्वसनीयता को सुनिश्चित करने के लिए व्यापक और समावेशी थी, जबकि मौजूदा प्रक्रिया अधूरी और समय की दृष्टि से अत्यंत संकुचित है।
इस विवाद की गूँज सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुकी है, जहां याचिकाकर्ताओं ने समय-सीमा और दस्तावेज़ आवश्यकताओं की चुनौती पेश की है। न्यायालय इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को पुनः शुरू करेगा। विश्लेषक मानते हैं कि यह मामला केवल तकनीकी मतदाता सूची का नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी की सुरक्षा से जुड़ा है। यदि तीन महीने की अवधि और EPIC की अनदेखी को न्यायालय मान्यता देता है, तो यह भविष्य में पूरे देश में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रियाओं पर लंबी छाया डाल सकता है।
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